रिपोर्ट:विकास श्रीवास्तव

मैं पत्रकार हूं
तुम्हारी वाली लिखे तो ठीक है अगर न लिखूं तो बेकार हूं
मैं पत्रकार हूं
अगर विपक्षी की तारीफ लिख दी तो चाटूकार हूं,
तुम्हारी लिखूं तो समझदार और ईमानदार हूँ,
मैं पत्रकार हूं।
न वेतन न भत्ता,बेकार की सत्ता
दिनभर घूमता बस एक किरदार हूं
मैं पत्रकार हूं
अखबार और चैनल से आगे हुए सोशल
बे..हया,बे..शरम कहते हैं… पत्तलकार हूं
मैं पत्रकार हूं
इधर-उधर घूमता,खबरें बनाता, उसके मन की न बनें तो आरोप लगाता ।
विपक्षी कहे गोदी-गोदी,पक्ष कहे गद्दार हूं।
मैं पत्रकार हूं
छोड़ दुनिया की फ़िक्र,जो दिखा वह लिखा कर ..
प्रवीणता इसी में है कि सच का साथ दे और कभी न झुका कर ।
इसीलिए सीना ठोंककर कहता हूं हां मैं पत्रकार हूं!
हां मैं पत्रकार हूं!
ना तो चाटुकार हू,ना तो पत्तलकार हूं,ना ही तुम्हारे रहमों करम का शुक्रगुजार हूं।
हां मैं पत्रकार हूं
साजिश चाहे जो कर ले बदनाम न तू कर पाएगा ।
सोना को जितना तपाओगे उतना ही निखरता जाएगा ।
मैं सागर हूं मुझे किसी की दरकार नहीं,
तूं गढ़ही,पोखरी, ताल,तलैया,मैं नहीं तेरा तलबगार हूं।
हां मैं पत्रकार हूं! हां मैं पत्रकार हूं
……. प्रवीण
नोट – मेरे द्वारा लिखी यह दूसरी कविता है। जुड़े लेखक यदि कोई त्रुटी हो तो संशोधित करने की कृपा करें।और यदि अच्छी लगे तो कमेंट कर हौसला बढ़ाएं


