spot_img
15.1 C
Varanasi
Saturday, February 14, 2026

Buy now

spot_img

हिंदी साहित्य आज भी सामंतवादी सोच से ग्रस्त है

spot_img

एस के श्रीवास्तव विकास

वाराणसी/-हिन्दी की दुर्दशा देखनी हो तो आजकल के तथाकथित स्नातकोत्तर विद्या वारिधि अर्थात एम ए और पीएच डी उपाधि धारकों को देखिए।आप को पता चल जाएगा हमने हिंदी के साथ कितना खेदजनक व्यवहार किया है।आज कल के युवा हिंदी की वर्तनी और व्याकरण से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं वे नौकरी के लिए एक आवेदन तक नहीं लिख पा रहे हैं।इसका कुछ भी कारण हो सकता है।यह मूल विषय नहीं है।सवाल है

हमने हिंदी के साथ कितना न्याय किया है।जो भाषाई ज्ञान पहले कक्षा पांच तक हो जाता करता था वह आज पीएच डी के बाद भी क्यों नहीं मिल पा रहा है।इसका दुष्परिणाम हिंदी में लिखी जा रही तथाकथित साहित्यिक रचनाओं में देखने के लिए सहज ही उपलब्ध है।कहने के लिए हिंदी साहित्य में बहुत कुछ लिखा जा रहा है।प्रकाशकों की भीड़ है जो तरह तरह के प्रलोभनों से लेखकों को अपनी रचनाएं छपवाने के लिए आकर्षित करते हैं और एवज में मोटी रकम वसूल रहे हैं।ये प्रकाशक अपने प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित पुस्तकों को विज्ञापित करने के लिए खर्चीले समारोह भी कर रहे हैं जिसमें कोई राजनेता या नामी बाबा उपस्थित होकर मजमा एकत्रित करने में सफल भी हो रहे हैं।इन सबका साहित्य से कुछ भी लेना देना नहीं होता लेकिन इससे लेखक को प्रतिस्थापित करवाने और पुस्तक को पुरस्कृत करवाने में भरपूर मदद मिलती है।सब मिला-जुलाकर यह व्यापार का मामला बन जाता है।पुस्तकें सरकारी संस्थाओं और पुस्तकालयों में थोक के भाव पहुंच जाती हैं।हिन्दी साहित्य का वर्तमान इसी परिवेश में घिरा हुआ है।जातिवाद क्षेत्रवाद का जितना घिनौना रूप आलोचकों और कुछ साहित्यकारों में व्याप्त है वह वास्तव में अत्यधिक दयनीय है।ऐसे ऐसे आलोचक हैं जो अपनी जाति और खेमे के रचनाकारों को प्रोत्साहित करते हैं वे उनके एजेंट के रूप में काम करते हैं।बाकायदा कुछ संस्थान इस तरह के गोरखधंधे में लगे हुए हैं।दरअसल हिंदी साहित्य में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे लेखकों और पुस्तकों की ग्रेडिंग हो सके जो लिख दिया वही साहित्य है।हिंदी साहित्य आज भी सामंतवादी सोच से ग्रस्त ही लगता है।इस तरह एक तरफ तो हिंदी के समक्ष व्याकरण और वर्तनी को लेकर गंभीर संकट है तो दूसरी तरफ घटिया लेखन को उच्च साहित्य समझने की प्रवृत्ति।जिन्होंने कुछ भी पढ़ा नहीं है,जो साहित्य के विषय में मौलिक जानकारी तक नहीं रखते वे भी साहित्यकार का पट्टा गले में डालकर गोष्ठियों और मंचों पर विभूषित हो रहे हैं।इसी कड़ी में कुछ सेवानिवृत्त प्रशासनिक व्यक्ति भी साहित्यकार बनकर नाम यश कीर्ति के लिए मैदान में उतरे हुए दिखते हैं जो अपने प्रशासनिक रुतबे का प्रदर्शन साहित्य में भी धौंस जमाने के लिए करते हैं।दुर्भाग्यवश ऐसे पूर्व नौकरशाह केवल इसलिए साहित्यकार के रूप में पूजित हो रहे हैं क्योंकि वे कभी प्रशासनिक अधिकारी थे।हिंदी को इन संकटों से जूझना पड़ रहा है।एक तरफ तो विश्वविद्यालयों में दोयम दर्जे के लोग आ चुके हैं जिनमें साहित्य की कोई समझ नहीं है।कहने मात्र को वे प्रोफेसर हैं लेकिन हकीकत में उन्हें सिर्फ पाठ्यक्रमों की सतही जानकारी होती है। हमने कुछ प्रोफेसरों को इस संदर्भ में परखा कि वे कोई समीक्षा लिखें लेकिन अधिकांश इधर उधर के बहाने बनाकर चलते बने।इन प्रोफेसर साहबान के पास आलोचना और समीक्षा के कोई औजार और हुनर ही नहीं हैं।ये केवल उन्हीं विषयों पर लिख या बोल सकते हैं जिनपर पूर्ववर्ती लेखकों ने अपनी विशद राय पहले से ही दे रखी है।ये लोग हिंदी साहित्य में आज भी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को ही आलोचना की धुरी मानते हैं। उन्हें सामाजिक वैश्विक परिवर्तन के दौर में नमी सामयिक समीक्षा और आलोचना से कुछ भी नहीं लेना देना।इन तथाकथित साहित्यकारों के लेखों में कोई गंभीरता नहीं।सिर्फ चुहलबाजी ही चुहलबाजी।एक तरह से ये लोग साहित्य का जनाजा धूमधाम से निकालने में व्यस्त हैं। सबसे सोचनीय बात तो यह हैं कि इन्हें ही साहित्य का मसीहा और ध्वजवाहक मानने की जो प्रवृत्ति दिख रही है उससे हिंदी साहित्य में नये युग का सूत्रपात विलंबित हो रहा है।

spot_img

सम्बन्धित ख़बरें

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

लेटेस्ट न्यूज़

error: Content is protected !!

Home

Latest News

Web Stories

WhatsApp